Pithora Painting: कला के रंग, पिथोरा चित्रकारी- मान्यता, कला और पहचान

भारत भवन से शुरू हुई यात्रा
झाबुआ के गांव पिटोल मोटी बावड़ी की रहने वाली भूरीबाई अब पिथोरा की शैली में चित्रकारी कर रही हैं। वे बताती हैं चूंकि पिथोरा पुरुषों द्वारा मन्नात पूरी होने पर पूजन के लिए ही बनाया जाता है इसलिए मैं तो इसे नहीं बनाती पर इसके अंकन की शैली को लेकर चित्रकारी कर रही हूं। विवाह के बाद जब पति के साथ मजदूरी करने भोपाल आई तो वहां भारत भवन का काम चल रहा था। उस वक्त वहां जे. स्वामीनाथन आए हुए थे और उन्होंने मुझसे जब चर्चा की तो इस कला के बारे में जाना और उसे वहां बनाने के लिए कहा। इस तरह मेरी कला यात्रा शुरू हुई जो करीब 40 वर्ष से जारी है।
समय के साथ हुआ बदलाव

 

 

एक समय था जब पिथोरा केवल चूने और खड़िया से बनती थी लेकिन मैं अपने मनोरंजन के लिए जो आकृतियां बनाती थी उसमें रंगों का उपयोग करती थी। फूल-पत्तों से लाल-हरा रंग और तवे की कालिख से प्राप्त काला रंग इनमें भरा करती थी। अब दीवार की कला लकड़ी के तख्ते, कागज, कैनवास पर भी आ गई और बाजार के रंग इसमें शामिल हो गए। मेरी तरह अब कई आदिवासी युवतियां इस शैली में कलाकृतियां बनाकर रोजगार प्राप्त कर रही हैं। वर्तमान में इसके जरिए अपनी पहचान बनाने वालों की संख्या करीब 20 हो गई है। वास्तव में यह कला आमजनजीवन के समीप होने और आकृतियों के सहज होने से लोगों के दिलों तक आसानी से पहुंच जाती है और यही इसकी लोकप्रियता की बड़ी वजह है।

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