गरीबी उन्मूलन दिवस : फुटपाथ पर बेचे जूते चप्पल, आज 30 लोगों के घर का चूल्हा जला रहे

दाल बाजार के व्यापारी की जो एक जमाने में फुटपाथ पर जूता चप्पल बेचने का काम करते थे। जिन्होंने ईमानदारी से काम किया और गरीबी के दंश को झेला और उससे खुद को ही नहीं आज दूसरों को गरीबी से मुक्त कराने का काम कर रहे हैं।

गरीबी में पैदा जरुर हुआ लेकिन गरीबी में मरुंगा नहीं। यह पंक्ति अक्सर फिल्मों में सुनी होंगी। लेकिन हकीकत में इन पंक्तियों के अनुरुप जिंदगी में संघर्ष कर एक मुकाम हासिल बिरले लोग ही करते हैं। हम बात कर रहे हैं आज दाल बाजार के व्यापारी की जो एक जमाने में फुटपाथ पर जूता चप्पल बेचने का काम करते थे। जिन्होंने ईमानदारी से काम किया और गरीबी के दंश को झेला और उससे खुद को ही नहीं आज दूसरों को गरीबी से मुक्त कराने का काम कर रहे हैं। सुरेश एंड कंपनी के मालिक सुरेश खत्री का कहना है कि सन 1952 में उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ। वह अपने पिता के साथ 1962-63 में बाड़े पर स्टेट बैंक के बाहर फुटपाथ पर जूता चप्पल बेचने का काम करते थे। उस वक्त एक जोड़ी चप्पल की कीमत 6 आना होती थी। समय बीतता गया और सेंट्रल लाइब्रेरी के बाहर लकड़ी की एक दुकान बना ली। जिस में वह खुद चाय बेचने का होटल संचालित करने लगे। होटल कुछ दिन चला लेकिन 1977 में इमरजेंसी लग गई।

जिसमें उनकी दुकान को तोड़ दिया गया। जिसके बाद वह फिर फुटपाथ पर आ गए। तबतक उनका विवाह हाे चुका था। फिर घर चलाने के लिए जिन्दगी में जद्दो जहिद शुरू हाे गई। फुटपाथ पर फिर से जूता चप्पल बेचने का काम करने लगे । तभी उन्हें सुभाष मार्केट में एक दुकान किराए से मिल गई। जहां पर उन्होंने शक्कर व चाय पत्ति बचने का काम शुरु किया। ईमानदारी से मेहनत करने पर दुकान चल निकली तो चाय,शक्कर का थोक का काम करने लगे। सन 1990 में उन्होंने दाल बाजार में दुकान खरीद ली जहां पर दाल चावल बेचने का थोक काम शुरू किया। आज उनका माल खरीदने अंचल से ही नहीं दूसरे राज्यों से दुकानदार आते हैं और इस काम में 30 लोगों को स्टाफ काम करता है।

सुरेश कुमार खत्री के जीवन की कहानी प्रेरणा दायक है। जिन्होंने फुटपाथ से काम शुरू किया और आज एक कंपनी के रुप में काम कर रहे हैं,जिसे वह अपने बेटे के साथ संभाल रहे हैं। गौरतलब है कि प्रतिवर्ष 17 अक्टूबर को पूरे विश्व में गरीबी उन्मूलन के लिए अंराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस के रुप में मनाया जाता है। यह दिवस गरीबी में रह रहे लोगों के लिए संघर्ष को जानने समझने और उनकी कठिनाईयों को दूर करने का प्रयासों का मौका देता है।

पानी की समस्या दूर की

सुरेश् कुमार बताते हैं कि जब 1990 में दाल बाजार पहुंचे ताे वहां पर राहगीरों व दुकानदारों के लिए पीने के पानी की बड़ी समस्या हुआ करती थी। जिस पर उन्होंने सबसे पहले वाटर टेंक बनवाया इसके बाद डेढ़ लाख रुपये खर्च कर चिलर लगवाया जिससे गर्मी के मौसम में राहगीरों को ठंडा पानी मिल सके। आज भी यह चिलर निरंतर संचालित रहता है। सुरेश कुमार का कहना हैकि उनके प्रतिष्ठाान पर कोई भी भुखाा प्यासा व्यक्ति यदि पहुंचता है तो उसे भोजन पानी उपलब्ध कराया जाता है। सुरेश खत्री का कहना है कि कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता लेकिन ईमानदारी से किया गया परिश्रम उसे एक दिन बड़ा जरुर बनाता है। गरीबी में पैदा होना आपके हाथ में नहीं लेकिन गरीब मरना ठीक नहीं।

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