संतुलित उर्वरक से खेती बचाने की बड़ी पहल, 100 किसान जुटे
भूमिका
ग्वालियर में किसानों को खेती की बदलती जरूरतों और मिट्टी की बिगड़ती स्थिति को लेकर जागरूक करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय संतुलित उर्वरक प्रबंधन और खरीफ फसलों में पोषक तत्वों का सही उपयोग रहा।
कृषि विज्ञान केन्द्र, ग्वालियर द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में किसानों को खेती की नई तकनीकों, प्राकृतिक खेती और फसल प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों और कृषक महिलाओं ने भाग लेकर विशेषज्ञों से सीधे संवाद किया।
संतुलित उर्वरक के सही उपयोग को लेकर विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इसी कारण अब खेती में संतुलन और प्राकृतिक उपायों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
मुख्य तथ्य
यह कृषक संगोष्ठी 29 मई 2026 को अंगीकृत ग्राम सिरसौद में आयोजित की गई। कार्यक्रम कृषि विज्ञान केन्द्र, ग्वालियर तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्षेत्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र, ग्वालियर के संयुक्त सहयोग से संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को खरीफ फसलों की बोनी से पहले संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी देना था ताकि खेती की लागत कम हो और उत्पादन बेहतर हो सके।
संगोष्ठी में तिल, ज्वार, धान और सब्जियों जैसी खरीफ फसलों में पोषक तत्वों के उपयोग, प्राकृतिक खेती, समन्वित कृषि प्रणाली तथा धान की सीधी बुवाई जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम में 100 से अधिक किसानों और कृषक महिलाओं ने भाग लिया। अंत में सहभागी किसानों को खरीफ फसलों में उपयोग के लिए जैव उर्वरक एसीटोबेक्टर की एक-एक बोतल भी वितरित की गई।
संतुलित उर्वरक पर विशेषज्ञों की अहम सलाह
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र, ग्वालियर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. शैलेन्द्र सिंह कुशवाह ने किसानों को बताया कि संतुलित उर्वरक का उपयोग खेती के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि लगातार डीएपी और यूरिया का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की भौतिक और जैविक स्थिति को नुकसान पहुंचा रहा है।
उन्होंने किसानों को समझाया कि फसलों की बेहतर वृद्धि के लिए केवल रासायनिक उर्वरक पर्याप्त नहीं होते। खेती में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ताकि मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहे।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन के तहत किसानों को गोबर की खाद, केंचुआ खाद और हरी खाद के उपयोग पर जोर दिया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन कार्बनिक स्रोतों से मिट्टी को सूक्ष्म पोषक तत्व मिलते हैं जो फसलों के लिए उपयोगी होते हैं।
विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी कि कम से कम दो साल के अंतराल में खेतों में कार्बनिक खाद का उपयोग अवश्य करें। इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है और फसलों की उत्पादकता भी बेहतर बनी रहती है।
खरीफ फसलों में पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी

संगोष्ठी में खरीफ फसलों की तैयारी और बोनी से पहले जरूरी प्रबंधन पर विशेष चर्चा की गई। किसानों को बताया गया कि फसल के अनुसार पोषक तत्वों का चयन करना जरूरी है।
तिल, ज्वार, धान और सब्जियों जैसी फसलों में अलग-अलग पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। यदि खेत में सही मात्रा में संतुलित उर्वरक का उपयोग किया जाए तो उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है।
वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी बताया कि खेत की मिट्टी की दशा को ध्यान में रखकर उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। केवल अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालना समाधान नहीं है।
संतुलित उर्वरक के साथ जैविक विकल्पों को जोड़ने से मिट्टी की उत्पादकता लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है। इससे खेती टिकाऊ बनती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।
समन्वित कृषि प्रणाली अपनाने की सलाह
कार्यक्रम में केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह चौहान ने किसानों को एकल फसल प्रणाली से बाहर निकलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि केवल एक फसल पर निर्भर रहने से खेती में जोखिम बढ़ जाता है।
उन्होंने किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली अपनाने के फायदे बताए। इसके तहत खेतों में फसलों के साथ मौसमी सब्जियां, फल के बगीचे, केंचुआ खाद, मछली पालन, मुर्गी पालन और बकरी पालन जैसे कार्यों को शामिल किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी व्यवस्था से किसानों की आय के अलग-अलग स्रोत बनते हैं और किसी एक फसल में नुकसान होने पर भी किसान आर्थिक संकट से बच सकता है।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन के साथ समन्वित कृषि प्रणाली खेती को अधिक सुरक्षित और लाभकारी बना सकती है। इससे खेती में विविधता आती है और खेत की मिट्टी का उपयोग भी बेहतर तरीके से हो पाता है।
धान की सीधी बुवाई पर जोर
संगोष्ठी के दौरान किसानों को धान की सीधी बुवाई विधि के बारे में भी जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह विधि समय और धन दोनों की बचत करने में सहायक हो सकती है।
धान की पारंपरिक रोपाई की तुलना में सीधी बुवाई से श्रम की आवश्यकता कम होती है। इससे किसानों को बोनी के दौरान कम खर्च करना पड़ता है।
विशेषज्ञों ने बताया कि धान की सीधी बुवाई से आगामी गेहूं फसल की बोनी भी समय पर की जा सकती है। इससे खेती का पूरा चक्र बेहतर तरीके से संचालित होता है।
संतुलित उर्वरक के साथ यदि आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाए तो खेती की लागत कम करने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि किसानों को नई तकनीकों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती पर विशेष चर्चा
कार्यक्रम में केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. एस.सी. श्रीवास्तव ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से कृषि उत्पादों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
उन्होंने किसानों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक उपायों के बारे में जानकारी दी। साथ ही इनके निर्माण और उपयोग की प्रक्रिया भी समझाई गई।
प्राकृतिक खेती के माध्यम से खेत की मिट्टी को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे खेती में रासायनिक निर्भरता कम होती है और उत्पादन प्रक्रिया अधिक संतुलित बनती है।
संतुलित उर्वरक और प्राकृतिक खेती के संयोजन को विशेषज्ञों ने भविष्य की जरूरत बताया। उनका मानना है कि इससे खेती लंबे समय तक टिकाऊ बनी रह सकती है।
आलू और सब्जियों में उर्वरक प्रबंधन
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्षेत्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र, ग्वालियर के वैज्ञानिक डॉ. सुभाष कटारे ने आलू और सब्जियों में संतुलित उर्वरक उपयोग पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने किसानों को बताया कि आलू और सब्जियों की फसलों में उर्वरकों का संतुलित उपयोग करना जरूरी है ताकि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर रह सकें।
इसके साथ ही आलू की फसलों में रोग और कीट प्रबंधन को लेकर भी किसानों को आवश्यक जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने फसल सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया।
खेती में संतुलित उर्वरक प्रबंधन केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि इससे फसलों को रोगों और नुकसान से बचाने में भी मदद मिल सकती है।
उन्नतशील प्रजातियों की जानकारी
कार्यक्रम में डॉ. मुरलीधर ने किसानों को आलू की उन्नतशील प्रजातियों और नई तकनीकों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने खेती में तकनीकी सुधारों के महत्व को समझाया।
किसानों को बताया गया कि नई तकनीकों को अपनाने से खेती अधिक व्यवस्थित और लाभकारी बनाई जा सकती है। उन्नतशील प्रजातियां बेहतर उत्पादन देने में सहायक हो सकती हैं।
विशेषज्ञों ने किसानों को यह भी समझाया कि खेती में वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने से लागत और उत्पादन के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
संतुलित उर्वरक के साथ यदि उन्नत तकनीकों और बेहतर प्रजातियों का उपयोग हो तो खेती की गुणवत्ता में सुधार संभव है।
कृषकों की बड़ी भागीदारी
इस कृषक संगोष्ठी में 100 से अधिक किसानों और कृषक महिलाओं की भागीदारी देखने को मिली। बड़ी संख्या में किसानों ने कार्यक्रम में पहुंचकर विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त की।
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने खेती में आ रही समस्याओं को लेकर भी सवाल पूछे। वैज्ञानिकों ने किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान किया और व्यावहारिक सुझाव दिए।
किसानों की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि अब खेती में नई तकनीकों और संतुलित उर्वरक प्रबंधन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।
ऐसे कार्यक्रम किसानों को सीधे वैज्ञानिकों से जोड़ने का काम करते हैं जिससे खेती में बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
जैव उर्वरक का वितरण
कार्यक्रम के अंत में सहभागी किसानों को जैव उर्वरक एसीटोबेक्टर की एक-एक बोतल वितरित की गई। इसका उपयोग खरीफ फसलों में किया जाएगा।
जैव उर्वरक का उद्देश्य खेतों में पोषक तत्वों की उपलब्धता को बेहतर बनाना है। इससे खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन के तहत जैव उर्वरकों का उपयोग खेती को अधिक संतुलित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कार्यक्रम में किसानों को जैव उर्वरकों के महत्व और उपयोग की जानकारी भी दी गई ताकि वे इसे सही तरीके से अपनी फसलों में उपयोग कर सकें।
विश्लेषण

ग्वालियर में आयोजित यह संगोष्ठी केवल एक सामान्य कृषि कार्यक्रम नहीं बल्कि खेती के बदलते स्वरूप की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखी जा रही है।
लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने की चिंता लंबे समय से सामने आती रही है। ऐसे में संतुलित उर्वरक प्रबंधन पर जोर देना भविष्य की खेती के लिए अहम माना जा रहा है।
कार्यक्रम में किसानों को प्राकृतिक खेती, जैव उर्वरक, समन्वित कृषि प्रणाली और आधुनिक तकनीकों के बारे में जो जानकारी दी गई वह खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
विशेषज्ञों द्वारा किसानों को सीधे प्रशिक्षण देने से खेत स्तर पर बदलाव की संभावनाएं बढ़ती हैं। इससे खेती की लागत, मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में सहायता मिल सकती है।
प्रभाव
इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा प्रभाव किसानों में जागरूकता बढ़ने के रूप में देखा जा सकता है। किसानों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि खेती केवल अधिक उर्वरक डालने से सफल नहीं होती बल्कि संतुलित प्रबंधन जरूरी है।
प्राकृतिक खेती और जैव उर्वरकों के उपयोग पर जोर देने से किसानों में वैकल्पिक उपायों को लेकर रुचि बढ़ सकती है। इससे खेती की लागत कम करने में भी सहायता मिल सकती है।
धान की सीधी बुवाई और समन्वित कृषि प्रणाली जैसी तकनीकों की जानकारी किसानों को खेती के नए विकल्प प्रदान कर सकती है।
संतुलित उर्वरक के उपयोग से मिट्टी की सेहत बेहतर बनाए रखने का संदेश किसानों तक पहुंचा है जो आने वाले समय में खेती के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।
भविष्य की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में खेती को टिकाऊ बनाने के लिए संतुलित उर्वरक और प्राकृतिक खेती दोनों पर एक साथ काम करना होगा।
यदि किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी लगातार पहुंचती रही तो खेती में रासायनिक निर्भरता को कम करने की दिशा में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
समन्वित कृषि प्रणाली और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देकर किसानों की आय के नए रास्ते भी तैयार किए जा सकते हैं।
ऐसे कृषक संगोष्ठी कार्यक्रम किसानों को नई तकनीकों और वैज्ञानिक सोच से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं जिससे खेती अधिक सुरक्षित और संतुलित बन सके।
निष्कर्ष

ग्वालियर में आयोजित कृषक संगोष्ठी ने किसानों को खेती के कई महत्वपूर्ण पहलुओं से अवगत कराया। कार्यक्रम में संतुलित उर्वरक प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, धान की सीधी बुवाई और समन्वित कृषि प्रणाली जैसे विषयों पर विस्तार से जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना उचित नहीं है। खेती में कार्बनिक और जैविक विकल्पों को भी शामिल करना आवश्यक है।
100 से अधिक किसानों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि अब किसान नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाह को अपनाने के प्रति जागरूक हो रहे हैं।
यदि इसी तरह किसानों को लगातार प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिलता रहा तो संतुलित उर्वरक आधारित खेती भविष्य में अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी साबित हो सकती है।
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