नियुक्ति पत्र नहीं देने पर विज्ञापन बंद हों, शारदा की बड़ी मांग

नियुक्ति पत्र नहीं देने पर विज्ञापन बंद हों, शारदा की बड़ी मांग

भूमिका

नियुक्ति पत्र को लेकर मध्यप्रदेश में एक बड़ा मुद्दा सामने आया है। मध्यप्रदेश श्रम सलाहकार परिषद के सदस्य राधावल्लभ शारदा ने मुख्यमंत्री और श्रम मंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि जिन मीडिया संस्थानों द्वारा पत्रकारों को नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

नियुक्ति पत्र नहीं मिलने से बड़ी संख्या में पत्रकार कई सरकारी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। शारदा ने इस विषय को गंभीर बताते हुए सरकार से सख्त कदम उठाने का सुझाव दिया है।

मुख्य तथ्य

राधावल्लभ शारदा ने अपने पत्र में कहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों को नियुक्ति पत्र दिलाने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की होनी चाहिए। इस कार्य में पुलिस कर्मियों और जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों की भी मदद ली जा सकती है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक जिले में श्रम विभाग के अधिकारियों की संख्या सीमित है, जबकि पुलिस कर्मियों की पहुंच गांव तक है। इसी कारण इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए अन्य विभागों की सहायता आवश्यक है।



महत्वपूर्ण बिंदु

पत्र में कहा गया है कि समाचार पत्रों के संवाददाता और एजेंट केवल समाचार भेजने तक सीमित नहीं रहते। वे वितरण, विज्ञापन लेने और बिक्री की राशि संस्थानों तक पहुंचाने जैसे कई कार्य भी करते हैं।

इसके बावजूद 99 प्रतिशत लोगों को संवाददाता का नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता। शारदा का कहना है कि जो व्यक्ति समाचार भेजने का काम करता है, उसे पत्रकार माना जाना चाहिए और उसे अधिकार भी मिलने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि समाचार पत्र छोटा या बड़ा नहीं होता और न ही पत्रकार छोटा या बड़ा होता है। सभी पत्रकारों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।

विस्तृत जानकारी

शारदा के अनुसार, नियुक्ति पत्र मिलने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पत्रकारों को सम्मान के साथ शासकीय योजनाओं का लाभ भी मिल सकेगा। इनमें बीमा योजना को सबसे महत्वपूर्ण बताया गया है।

जनसंपर्क विभाग के माध्यम से गैर अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों को बीमा प्रीमियम की लगभग आधी राशि सरकार द्वारा दी जाती है। नियुक्ति पत्र प्राप्त पत्रकारों का बीमा दो लाख और चार लाख रुपये तक का है।

इस योजना में पत्रकार के परिवार के सदस्यों को भी शामिल किया गया है। यदि किसी को पुरानी बीमारी है तो उसके इलाज की सुविधा भी इस योजना में उपलब्ध है।



विश्लेषण

पत्र में श्रम कानून के पालन पर भी जोर दिया गया है। शारदा ने कहा कि केंद्र सरकार ने श्रम कानून में संशोधन किया है और उसकी पहली शर्त नियुक्ति पत्र जारी करना है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी कर्मचारी को नियुक्ति पत्र नहीं मिला है तो इसकी जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की है। केवल शिकायत का इंतजार करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे अपराधी स्वयं पुलिस के पास जाकर अपने अपराध की जानकारी नहीं देता, उसी तरह नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों से भी स्वतः शिकायत की उम्मीद नहीं की जा सकती।

इसलिए श्रम विभाग को स्वयं संस्थानों और कर्मचारियों के बीच जाकर जानकारी एकत्र करनी चाहिए कि कितने लोग कार्यरत हैं और उन्हें नियुक्ति पत्र दिया गया है या नहीं।

प्रभाव

शारदा ने सुझाव दिया है कि इस अभियान की शुरुआत सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों से समाचार भेजने वाले पत्रकारों से की जाए। उनका मानना है कि गांवों में काम करने वाले पत्रकार सबसे अधिक प्रभावित हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस कर्मियों को यह अधिकार दिया जाए कि वे समाचार भेजने वाले व्यक्तियों से नियुक्ति पत्र की जानकारी लें। यदि किसी के पास नियुक्ति पत्र नहीं है तो इसकी सूचना पुलिस अधीक्षक को दी जाए।

इसके बाद पुलिस अधीक्षक यह जानकारी श्रमायुक्त तक पहुंचाएं और श्रमायुक्त संबंधित मीडिया संस्थान पर कार्रवाई करें।



भविष्य की दिशा

पत्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि जिन मीडिया संस्थानों द्वारा नियमों का पालन नहीं किया जाता, उनके सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए जाएं। केवल जनसंपर्क विभाग ही नहीं बल्कि राज्य सरकार के अधीन आने वाले अन्य संस्थानों के विज्ञापनों पर भी रोक लगाई जाए।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मीडिया संस्थान श्रम कानूनों का पालन करें और पत्रकारों को उनके अधिकार मिल सकें।

यदि इस दिशा में कार्रवाई होती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत पत्रकारों को नियुक्ति पत्र और उससे जुड़े लाभ मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

निष्कर्ष

मध्यप्रदेश श्रम सलाहकार परिषद के सदस्य राधावल्लभ शारदा ने सरकार को दिए अपने सुझाव में पत्रकारों के अधिकारों को केंद्र में रखा है। उन्होंने नियुक्ति पत्र को केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि सम्मान और सुरक्षा से जोड़कर देखा है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस सुझाव पर क्या निर्णय लेती है और पत्रकारों को उनके अधिकार दिलाने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

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